Friday, 2 December 2011

देश में है पर इसमें देश अनुपस्थित है....

 एक इलाके तक मैं आपको ले जाना चाहता हूं। जसलमेर का इक हिस्सा है शाहगढ़। आपलोग लिखना चाहें तो लिखिए। उसको मैप में ढ़ूंढ़ना चाहें तो ढूंढ़ये   क्योंकि ये बड़ा विचित्र इलाका है। हमारे देश में है पर इसमें देश अनुपस्थित है। इस बात को आप बाकायदा लिख सकते हैं। हमारे देश के जिस संगठनों का, व्यवस्था का जो-जो प्रतिनिधि माना गया है वो आपको नितांत अनुपस्थित मिलेगा शाहगढ़ में। जैसे- चुनाव नहीं होता, उन गांवों में वोट नहीं पड़ते। क्या इसकी रिपोर्ट मीडिया को करने की जरूरत कभी नहीं लगी। वहां पर क्या-क्या नहीं है उसकी सूची अगर बनाएंगे तो अस्पताल, डाक खाना, बाजार भी नहीं है, छोटी दुकान भी नहीं है। कोई चीज नहीं है। स्कूल नहीं है। कोई सरकारी दफ्रतर नहीं है, पंचायत नहीं है। बातचीत चलते-चलते यहां पहुंची, हमलोगों की कुछ आदत है कि हमलोग जात बगैरह नहीं पूछते। सब मुसलमान आबादी है शाहगढ़ की। लेकिन मस्जिद भी नहीं दिखा, मंदिर भी भी दिखा। मंदिर तो तब होता जब कोई हिन्दु होता। मुसलमान हैं लेकिन मस्जिद नहीं है। तो उनसे पूछने की हिम्मत भी नहीं होती। लोगों ने कहा मस्जिद का हम क्या करेंगे। इमाम कौन होगा हमारा? हमलोग तो सब दिनरात काम करते हैं तब आनंद के साथ जीवन जीते हैं। कष्ट नहीं है उनको। खेती नहीं है। एक इंच खेती नहीं है उस इलाके में क्योंकि पानी नहीं है।
  शाहगढ़ का इलाका नो फ्रलो जोन कहलाता है जिसमें  पानी इतना कम गिरता है कि पानी गिरकर जमीन पर बहता नहीं है। पचास डिग्री टेम्पेरेचर, पानी पूरा सूख जाता है। चार-पांच बूंदों की बौछार होती है। क्या-क्या नहीं है कि सूची चलते-चलते हमारे साथ कोई मित्रा थे, मुझमें तो इतनी हिम्मत भी नहीं थी कि माईक-वाईक आगे करके उनसे पूछता कि आप बताइए कि बिना स्कूल के कैसे रहते हैं? बिना अस्पताल के कैसे रहते हैं? बिना मस्जिद के कैसे रहते हैं? उन्होंने हमारे मित्रा की जिज्ञासा देखकर आखिरी एक वाक्य कहा जो आपको चैंका सकता है। यहां कोई पटवारी भी नहीं है भाई। यानी स्वामित्व नहीं है। जमीन की कीमत नहीं है। सिपर्फ पानी की कीमत है।
  हमारी एक किताब की प्रशंसा में अरविंद मोहन भाई ने कुछ लिखा है। उस किताब का शीर्षक है- ;आज भी खरे हैं तालाबद्ध शाहगढ़ में वो किताब आपको अनुपस्थित मिलेगी क्योंकि वहां कोई भी तालाब नहीं बन सकता। बहुत बड़ा इलाका है लेकिन तालाब भी बनाना मुर्खता होगी। इतना कम पानी गिरता है गर्म तबे पर कि दो बूंद पड़ते ही छन्न हो जाता है। कुछ कूएं समाज ने ढ़ूंढ़ कर रखे हैं उनमें मिठा पानी है। सरकार कभी आयी नहीं है लेकिन एकाध् सुन्दर अध्किारी धेखे से शाहगढ़ पहुंचा तो उसने ट्यूबवेल लगाया। लेकिन वो इतना खरा था, अभी आपको वो ट्यूबेवेल, हैंडपम्प लगा मिल जाएगा। इस इलाके में जो स्वराज है। जिस तरह से लोग मिलकर रहते हैं।
  तलाक तक की बात आयी, तो उन्होंने कहा तलाक देकर जाएंगे कहां? किसको छोड़ के जाना और किसको अपनाना। यही हमारा समाज है। क्या शाहगढ़ पर कभी किसी मीडिया को जसलमेर में वहां के पत्राकार को वहां  आरएसएस की शाखा भी लगती होगी जसलमेर में, वहां हिन्दु धर्म  के भी सब झंडे उठाने वाले होंगे। समाजवाद के भी लोग होंगे, अन्ना के भी होंगें। कभी किसी को भी नहीं लगा कि शाहगढ़ हमारा टुकड़ा  है। उसको जाकर एकबार सलाम करके आ जाएं हम। इन लोगों से मिल लें। दस-दस, बीस-बीस साल तक अगर उस इलाके में कोई हिन्दुस्तान का आदमी न जाता हो, और वो हिन्दुस्तान का हिस्सा हो तो क्या हमारी मीडिया की भूमिका! और क्या हमारी छोटी मीडिया की भूमिका। किसी छोटी मीडिया की पत्रिका में आपने शाहगढ़ के बारे पढ़ा? -- अनुपम मिश्र !!

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